61वें संविधान संशोधन से लेकर 90वें संविधान संशोधन तक, भारतीय संविधान के संशोधन
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| 61वें संविधान संशोधन से लेकर 90वें संविधान संशोधन तक |
भारतीय संविधान के संशोधन भाग-3
(61वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1989
· इस अधिनियम के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 326 का संशोधन करके मताधिकार की आयु 21 से घटकर 18 वर्ष कर दी गई, ताकि देश के उस युवा-वर्ग को जिसे अभी तक कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया था, अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का अवसर मिल सके और वे राजनीतिक प्रक्रिया का अंग बन सकें।
(62वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1989
· संविधान के अनुच्छेद 334 में यह प्रावधान है कि अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की सीटों के आरक्षण तथा लोकसभा और विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रतिनिधित्व से संबंधित व्यवस्था संविधान में लागू होने के 40 वर्ष बाद समाप्त हो जाएगी।
· हालांकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों ने गत 40 वर्षों में पर्याप्त प्रगति की है, किंतु संविधान सभा के सामने इस तरह की व्यवस्था बनाते समय जो कारण थे, वे अभी बरकरार हैं।
· इस अधिनियम के द्वारा अनुच्छेद 334 को संशोधित करके यह व्यवस्था की गई कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों का आरक्षण और आंग्ल-भारतीय समुदाय का मनोनयन द्वारा प्रतिनिधित्व अगले 10 वर्षों तक जारी रहेगा।
(63वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1989
· संविधान (59 संशोधन) अधिनियम मार्च 1988 में लागू किया गया, जिससे पंजाब में आपात स्थिति की घोषणा और राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि के संबंध में कुछ परिवर्तन किए गए थे।
· इस पर पुनर्विचार करने पर सरकार ने निर्णय किया कि संशोधन में पंजाब में आपात स्थिति की घोषणा के संबंध में जिस विशेष अधिकारी की व्यवस्था की गई थी, उसकी अब जरूरत नहीं रही।
· तद्नुसार, अनुच्छेद 356 की धारा 5 तथा अनुच्छेद 359(क) को हटा दिया गया है।
(64वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1990
· इस अधिनियम के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 356 की धारा 4 व 5 के अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद 356 की धारा 1 के तहत पंजाब के संबंध में 11 मई 1987 को संशोधित की गई घोषणा की अवधि को साढ़े-तीन वर्ष के लिए और बढ़ा दिया गया।
(65वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1990
· संविधान के अनुच्छेद 338 में एक विशेष अधिकारी का प्रावधान है, जो संविधान के तहत अनुसूचित जातियों और जनजातियों के हितों से संबंधित मामलों की जाँच करेगा और इस संबंध में राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट भेजेगा। यह अनुच्छेद संशोधित कर दिया गया है। जिसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट भेजेगा।
· यह अनुच्छेद संशोधित कर दिया गया है।
· जिसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग के गठन की व्यवस्था की गई है, जिसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्याक्ष तथा पाँच अन्य सदस्य होंगे, जिन्हें राष्ट्रपति अपनी मुहर से नियुक्त करेंगे।
· संशोधित अनुच्छेद में आयोग के कार्यों के बारे में विस्तार से बताया गया है और उसके उन कदमों के बारे में भी बताया गया है, जो उसे केंद्र अथवा राज्य सरकार को कमीशन की रिपोर्ट के प्रभावी कार्यांवयन के लिए उठाने होंगे।
· इसमें यह भी व्यवस्था की गई है कि आयोग के पास शिकायत पर की जाने वाली जाँच के दौरान वे सभी अधिकार होंगे, जो कि एक न्यायिक अदालत को होते हैं और आयोग की रिपोर्ट संसद और राज्य विधानसभाओं के समक्ष रखी जाएगी।
(66वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1990
· इस अधिनियम के तहत भूमि सुधार तथा कृषि भूमि की सीमा से संबंधित राज्य सरकारों के उन 55 नियमों को संविधान की नौंवी अनुसूची में शामिल तथा सुरक्षित कर दिया गया है, जिन्हें आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, चेन्नई, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केंद्रशासित प्रदेश पांडिचेरी के प्रशासन ने इस आशय से बनाया था कि इन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।
(67वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1990
· संविधान के 64वें संशोधन के तहत पंजाब के संबंध में 11 मई, 1987 को की गई घोषणा को साढ़े-तीन वर्ष किया था जिसे अब बढ़ाकर चार वर्ष किया गया।
· 67वें संशोधन के तहत अनुच्छेद 356 की धारा 4 को पुन: संशोधित करके इस अवधि को बढ़ाकर चार वर्ष कर दिया गया है।
(68वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1991
· संविधान के 67वें संशोधन के तहत पंजाब के संबंध में 11 मई, 1987 को की गई घोषणा को बढ़ाकर चार वर्ष किया गया था।
· 68वें संशोधन के तहत अनुच्छेद 356 की धारा 4 को संशोधित करके इस अवधि को बढ़ाकर पाँच वर्ष कर दिया गया है।
(69वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1991
· भारत सरकार ने 24 दिसम्बर 1987 को दिल्ली के प्रशासन से संबंधित विभिन्न मामलों का अध्ययन करने तथा प्रशासनिक ढाँचे को चुस्त बनाने के उपाय सुझाने के लिए एक कमेटी गठित की थी।
· पूरी जाँच-पड़ताल और अध्ययन के बाद इस समिति ने यह सिफारिश की थी कि दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश बना रहे और इसमें एक विधानसभा तथा एक मंत्रिपरिषद भी हो, जो आम आदमी से संबंधित मामलों के बारे में पूरी तरह से अधिकारसंपन्न हो।
· कमेटी ने यह सिफारिश की थी कि स्थायित्व और सुदृढ़ता को दृष्टि में रखते हुए एसी व्यवस्था की जाए, जिससे राष्ट्रीय राजधानी को अन्य केंद्रशासित प्रदेशों की तुलना में एक विशेष दर्जा प्राप्त हो।
· यह अधिनियम उपरोक्त सिफारिशों को लागू करने के लिए पारित किया गया।
(70वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1992
· संविधान (69वां संशोधन) विधेयक, 1991 और राष्ट्रीय राजधानी सीमा क्षेत्र सरकार, विधेयक 1991 पर संसद के दोनों सदनों में विचार प्रकट करते समय केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों को भी संविधान के अनुच्छेद 54 के अंतर्गत राष्ट्रपति के चुनाव के लिए निर्वाचनमंडल में शामिल करने के पक्ष में विचार प्रकट किए गए।
· इस समय राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित अनुच्छेद 54 में निर्वाचनमंडल के लिए केवल निर्वाचित संसद सदस्यों और राज्यों के विधानसभा सदस्यों (इसमें केंद्रशासित प्रदेश शामिल नहीं है) को शामिल करने का प्रावधान है।
· इसी प्रकार अनुच्छेद 55 में इस प्रकार के चुनाव के तरीके के लिए राज्यों की विधानसभाओं की भी बात की गई है।
· अनुच्छेद 55 में शामिल की गई एक व्याख्या के अनुसार अनुच्छेद 54 और 55 में राज्य के संदर्भ में इस बात का प्रावधान किया गया कि इसमें राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचनमंडल में राष्ट्रीय राजधानी सीमा क्षेत्र दिल्ली और केंद्रशासित प्रदेश पांडिचेरी को भी शामिल किया जाएगा।
· इससे अनुच्छेद 239-ए के प्रावधानों के तहत केंद्रशासित प्रदेश पांडिचेरी के लिए बनाई गई विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों और अनुच्छेद 239-ए के अंतर्गत राष्ट्रीय राजधानी सीमा क्षेत्र दिल्ली की प्रस्तावित विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों को भी निर्वाचन-मंडल में शामिल किया जा सकेगा।
(71वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1992
· संविधान की आठवीं अनुसूची में कुछ भाषाएँ और जोड़ने की माँग चल रही थी।
· इस अधिनियम से संविधान की आठवीं अनुसूची में संशोधन करके इसमें कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषाओं को शामिल किया गया है।
(72वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1992
· त्रिपुरा राज्य में जहाँ गड़बड़ी का माहौल बना हुआ है, शांति और सद्भाव कायम करने के लिए गत 12 अगस्त, 1988 को भारत सरकार और त्रिपुरा राष्ट्रीय स्वयंसेवकों के बीच एक समझौते को लागू करने के लिए संविधान (72वाँ संशोधन) अधिनियम,1992 माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 332 में संशोधन किया गया है, ताकि त्रिपुरा राज्य विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित करने के लिए तब तक के लिए अस्थाई व्यवस्था की जा सके, जब तक कि संविधान के 170 वें अनुच्छेद के अंतर्गत वर्ष 2000 के बाद प्रथम जनगणना के आधार पर सीटों का तालमेल न हो जाए।
(73वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1993
· संविधान के अनुच्छेद 40 में सुरक्षित किए गए राज्यों की नीति निर्देशक सिद्धांतों में से एक में यह कहा गया है कि राज्यों को ग्राम पंचायतों का गठन करने और उन्हें वे सभी अधिकार प्रदान करने के लिए क़दम उठाने चाहिए, जो उन्हें एक स्वायत्तशासी सरकार की इकाइयों के रूप में काम करने के लिए आवश्यक हैं।
· इसका उद्देश्य अन्य चीजों के अलावा, एक गाँव में अथवा गाँवों के समूह में ग्रामसभा स्थापित करना, गाँव के स्तर पर तथा अन्य स्तरों पर पंचायतों का गठन करना, गाँव और उसके बीच के स्तर पर पंचायतों की सभी सीटों के लिए सीधे चुनाव करना, ऐसे स्तरों पर पंचायतों के यदि सरपंच हैं तो उनका चुनाव कराना, पंचायतों में सदस्यता के लिए और सभी स्तरों पर पंचायत के पदाधिकारियों के चुनाव के लिए जनसंख्या के आधार पर अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण, महिलाओं के लिए कम-से-कम एक-तिहाई सीटों का आरक्षण, पंचायतों के लिए पाँच साल की कार्यवधि तय करना और यदि कोई पंचायत भंग हो जाती है तो छह महीने के भीतर उसका चुनाव कराने की व्यवस्था करना है।
(74वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1993
· अनेक राज्यों के विभिन्न कारणों से स्थानीय निकाय कमजोर और बेअसर हो गए हैं।
· इनमें नियमित चुनाव न होना, लंबे समय तक भंग रहना और कर्तव्यों तथा अधिकारों का समुचित हस्तांतरण न होना शामिल हैं।
· इसके परिणामस्वरूप, शहरी स्थानीय निकाय एक स्वायत्तशासी सरकार की जीवंत लोकतांत्रित इकाई के रूप में कारगर ढ़ग से कम नहीं कर पा रहे हैं।
· इन खामियों को देखते हुए संविधान में पालिकाओं के संबंध में एक नया भाग 9 ए शामिल किया गया है, ताकि अन्य चीजों के अलावा निम्नलिखित प्रावधान किए जा सकें: तीन तरह की पालिकाओं का गठन, जैसे कि ग्रामीण से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहे क्षेत्रों के लिए नगर पंचायतों, छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए नगर परिषदें और बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए नगर निगम।
(75वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1994
· इन दिनों विभिन्न राज्यों में जो किराया नियंत्रण क़ानून लागू हैं, उनमें कई खामियाँ हैं, जिनके कारण अनेक अवांछनीय परिणाम हो रहे हैं।
· किराया नियंत्रण क़ानूनों के कुछ वैधानिक दुष्परिणाम हैं-लगातार बढ़ती हुई मुकदमेबाजी, न्यायलायों द्वारा समय पर न्याय न दे पाना, किराया नियंत्रण क़ानूनों से बचने के तरीके निकालना और किराए के लिए मिल सकने वाले मकानों की निरंतर कमी।
· उच्चतम न्यायालय ने देश में किराया नियंत्रण क़ानूनों की अनिश्चित और तर्करहित स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रभाकरण नय्यर और अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य (सिविल रिट पेटीशन संख्या 506 ऑफ 1986) तथा अन्य रिट याचिकाओं के संर्दभ में यह विचार प्रकट किया था कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को किराया कानूनों के जबर्दस्त भार से मुक्त कर दिया जाना चाहिए।
· इन मुकदमों में अपील करने के अवसर कम कर दिए जाने चाहिए।
· किराया नियंत्रण क़ानून, सरल, विवेकपूर्ण और स्पष्ट होने चाहिए।
· मुकदमेबाजी जल्दी ही अवश्य समाप्त हो जानी चाहिए।
(76वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1994
· पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए शिक्षा संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में स्थान सुरक्षित करने की नीति का लंबा इतिहास 1921 में तमिलनाडु से शुरू हुआ था।
· राज्य सरकार अधिकांश लोगों की आवश्यकता के अनुरूप सुरक्षित स्थानों की संख्या समय-समय पर बढ़ती रही।
· अब सुरक्षित स्थानों की संख्या बढ़कर 69 प्रतिशत हो गई है-18 प्रतिशत अनुसूचित जातियाँ, एक प्रतिशत अनुसूचित जनजातियाँ और 50 प्रतिशत अन्य पिछड़े वर्ग।
· उच्चतम न्यायालय ने इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत सरकार और अन्य (ए आई आर 1993 एस सी 477) में 16 नवम्बर 1992 को फैसला दिया कि अनुच्छेद 16(4) के अधीन कुल सुरक्षित स्थानों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।
· तमिलनाडु सरकार ने तमिलनाडु पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों (शिक्षा संस्थाओं में स्थान और राज्य के अधीन नौकरियाँ या पद सुरक्षित करना) विधेयक 1993 पारित कर, इसे संविधान के अनुच्छेद 31सी की व्यवस्थाओं के अनुसार भारत के राष्ट्रपति के विचारार्थ भारत सरकार के पास भेजा।
· भारत सरकार ने राज्य सरकार के इस क़ानून की व्यवस्थाओं का अनुमोदन किया और राष्ट्रपति ने तमिलनाडु के इस विधेयक को स्वीकृति दे दी।
· इस निश्चय के परिणास्वरूप यह जरूरी था कि 1994 के तमिलनाडु क़ानून, 45 को संविधान की नौवीं अनुसूची की परिधि में लाया जाए, ताकि संविधान के अनुच्छेद 31 बी के अधीन न्यायालयों द्वारा विचार न कर सकने के बारे में इस क़ानून को संरक्षण मिल सके।
(77वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1995
· अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लोगों को 1955 से ही पदोन्नतियों में आरक्षण की सुविधा मिल रही है।
· लेकिन इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत सरकार और अन्य के मुकदमे में 16 नवम्बर 1992 को उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अंतर्गत नियुक्तियों अथवा पदों का आरक्षण केवल शुरू में की जाने वाली नियुक्ति पर लागू होता है तथा इसे पदोन्नतियों के मामले में आरक्षण पर लागू किया जा सकता है।
· उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से अनुसूचित जाति और जनजाति के हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
· चूंकि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का राज्य की नौकरियों में प्रतिनिधित्व अभी उस स्तर तक नहीं पहूँचा है जिस स्तर पर होना चाहिए था, अत: अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने की वर्तमान छूट को जारी रखना आवश्यक है।
· अनुसूचित जाति और जनजाति के हितों की रक्षा के प्रति सरकार की वचनबद्धता को देखते हुए सरकार ने जारी रखना आवश्यक है।
· अनुसूचित जाति और जनजाति के हितों की रक्षा के प्रति सरकार की वचनबद्धता को देखते हुए सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पदोन्नतियों में आरक्षण की वर्तमान नीति को जारी रखने का फैसला किया है।
· इसके लिए यह आवश्यक था कि संविधान के अनुच्छेद 16 में एक नई धारा (4 ए) जोड़कर उसमें संशोधन किया जाए, ताकि अनुसूचित जाति और जनजाति को पदोन्नतियों में आरक्षण प्रदान किया जा सके।
· यह क़ानून उपरोक्त उद्देश्य पूरा करने के लिए है।
(78वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1995
· संविधान का अनुच्छेद 31वीं नौवीं अनुसूची में शामिल उन क़ानूनों को इस आधार पर क़ानूनी चुनौती देने से संवैधानिक छूट प्रदान करता है कि इससे संविधान के खंड-3 में सुरक्षित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।
· इस अनुसूची में विभिन्न राज्यों की सरकारों और केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए क़ानूनों की सूची है, जो अन्य चीजों के अलावा भूमि-सहित संपत्ति के हितों और अधिकारों को प्रभावित करती हैं।
· पहले जब कभी यह महसूस किया गया कि जिन प्रगतिशील क़ानूनों की परिकल्पना जनता के हित में गई है, उन्हें मुकदमेबाजी का ख़तरा है तो उसके लिए नौवीं अनुसूची का सहारा लिया गया।
· तदनुसार, भूमि सुधारों और कृषि योग्य भूमि की हदबंदी से संबंधित विभिन्न राज्यों के क़ानूनों को पहले ही नौंवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया है।
· चूंकि सरकार भूमि सुधारों को महत्त्व देने के प्रति वचनबद्ध है, अत: भूमि सुधार क़ानूनों को नौंवीं अनुसूची में शामिल करने का फैसला लिया गया, ताकि उन्हें अदालतों में चुनौती न दी जा सके।
· बिहार, कर्नाटक, केरल, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकारों ने भूमि से संबंधित अपने क़ानूनों को नौवीं अनुसूची में शामिल करने का सुझाव दिया है।
· चूंकि उन क़ानूनों में संशोधन को, जो पहले ही नौंवी अनुसूची में शामिल हैं, क़ानूनी चुनौती से स्वत: छूट नहीं मिली हुई है, अत: नौंवीं अनुसूची में कुछ मूलभूत क़ानूनों के साथ-साथ अनेक संशोधित क़ानूनों को भी शामिल किया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लागू होने पर ये क़ानून मुकदमेबाजी से प्रभावित नहीं होंगें।
(79वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1999
· इस क़ानून द्वारा सरकार ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों तथा एंग्लो इंडियंस के लिए लोकसभा में और राज्यों की विधानसभाओं में आरक्षण दस वर्षों के लिए बढ़ा दिया है।
(80वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2000
· दसवें वित्त आयोग की सिफरिशों के आधार पर संविधान (80 वाँ संशोधन) अधिनियम-2000 में संघ और राज्यों के बीच करों से एकत्र राजस्व बाँटने के बारे में वैकल्पिक योजना पर अमल करने की व्यवस्था की गई है।
· इस योजना के अनुसार आयकर, उत्पादन शुल्कों, विशेषत: उत्पादन शुल्कों तथा रेल यात्री किरायों पर कर के बदले अनुदानों के लिए अब तक राज्य सरकारों को केंद्रीय करों तथा शुल्कों से एकत्र कुल राजस्व का जितना हिस्सा मिलता था अब उसका 26 प्रतिशत भाग राज्यों को दिया जाएगा।
(81वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2000
· इस संशोधन के द्वारा व्यवस्था की गई है कि संविधान के अनुच्छेद 16 की किसी भी व्यवस्था के अधीन अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए वर्ष में जितने ख़ाली सरकारी पद आरक्षित हैं यदि वे पद उस वर्ष नहीं भरे जाते हैं तो उन पर आगामी वर्ष में या वर्षों में जो नियुक्तियों को सम्बद्ध नियुक्ति वर्ष के कुल पदों के पचास प्रतिशत आरक्षित पदों की अधिकतम सीमा निर्धारित करने के लिए शामिल नहीं किया जाएगा।
(82वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2000
· इस संशोधन के द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि संघ या किसी राज्य के मामलों से सम्बद्ध किसी सेवा के किन्हीं वर्गों या वर्ग अथवा पदों पर पदोन्नति देने के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सदस्यों के पक्ष में किसी परीक्षा के अर्हता अंकों में अथवा मूल्यांकन के स्तरों में नरमी बरतने के लिए की गई किसी व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद 335 का कोई भी प्रावधान राज्य को नहीं रोक सकेगा।
(83वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2000
· इस कानून द्वारा संविधान के अनुच्छेद 243 (ए) में संशोधन कर व्यवस्था की गई है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों से पूरी तरह आबाद अरुणाचल प्रदेश की पंचायतों में अनुसूचित जातियों के लिए किसी प्रकार का आरक्षण करने की आवश्यकता नहीं है।
(84वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2001
· इस क़ानून द्वारा संविधान के अनुच्छेद 82 और 170(3) की शर्तों में संशोधन किया गया है ताकि वर्ष 1991 की जनगणना के दौरान सुनिश्चित की गयी आबादी के आधार पर प्रत्येक राज्य के लिए आबंटित लोकसभा सीटों और राज्यों की विधानसभा सीटों की संख्या में कोई परिवर्तन किए बगैर राज्यों में निर्वाचन क्षेत्रों को परिवर्तित तथा पुनर्गठित किया जा सके।
· इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के निर्वाचन क्षेत्र भी शामिल हैं।
· ऐसा विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में आबादी/मतदाताओं की संख्या में अनियमित वृद्धि के कारण पैदा हुए असंतुलन के दूर करने के लिए किया गया है।
· इससे वर्ष 1991 की जनगणना के दौरान सुनिश्चित की गयी आबादी के आधार पर राज्यों की विधानसभाओं और लोकसभा के लिए आरक्षित, अनुसूचित और जनजाति की सीटों की संख्या भी फिर से निर्धारित की जा सकेगी।
(85वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2001
· इस क़ानून द्वारा संविधान के अनुच्छेद 16 (4ए) में संशोधन किया गया है ताकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सरकारी कर्मचारियों को आरक्षण नियमों के तहत पदोन्नति के मामले में आनुषंगिक वरीयता प्रदान की जा सके।
· इसे 17 जून, 1995 से प्रभावी माना गया है।
(86वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2002
· इसका संबंध अनुच्छेद 21 के पश्चात जोड़े गए नए अनुच्छेद 21 ए से है।
· नया अनुच्छेद 21ए, शिक्षा के अधिकार से संबंधित है- राज्य को 6 से 14 साल तक के सभी बच्चों को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करानी होगी। यह संबंधित राज्य द्वारा निर्धारित क़ानून के तहत होगी।
· संविधान के अनुच्छेद 45 में निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा गया है जिसमें छह साल से कम उम्र के बच्चों की शुरुआती देखभाल और उनकी शिक्षा की व्यवस्था की गई है।
· अनुच्छेद 45 राज्य को तब तक सभी बच्चों की शुरुआती देखभाल और शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए प्रयास करना होगा जब तक वह छह साल की आयु का नहीं हो जाता है।
· संविधान के अनुच्छेद 51 ए में संशोधन करके (J) के बाद नया अनुच्छेद (K) जोड़ा गया है] "इसमें छह साल से 14 साल तक की आयु के बच्चे के माता-पिता या अभिभावाक अथवा संरक्षक को अपने बच्चे को शिक्षा दिलाने के लिए अवसर उपलब्ध कराने का प्रावधान है।"
(87वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2003
· संविधान के अनुच्छेद 81 के खंड (3) के उपबंध में धारा (ii) में, '1991' की जगह '2001' लिखा जाए।
· संविधान के अनुच्छेद 82 के तीसरे उपबंध की धारा (ii) में '1991' की जगह '2001' लिखा जाए।
· संविधान के अनुच्छेद 170 व्याख्या में धारा 2 (i) के उपबंध में '1991' की जगह '2001' लिखा जाए।
· अनुच्छेद 330 में व्याख्या में उपखंड में '1991' की जगह '2001' लिखा जाए।
(88वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2003
· यह संशोधन केंद्र सरकार द्वारा सरकारी बजट में अधिसूचित होने की तारीख से प्रभावी माना जाएगा।
· संविधान के अनुच्छेद 268 के बाद निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाए:
o "268 ए (1) सेवाओं पर कर भारत सरकार द्वारा लगाया जाएगा और इन करों का संग्रहण और उपयोग भारत सरकार और राज्यों द्वारा धारा (2) में दिए प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा।"
o (2) किसी भी वित्तीय वर्ष में धारा (1) में दिए गए प्रावधानों के मुताबिक लगाए गए ऐसे किसी भी कर को- (क) भारत सरकार और राज्य एकत्रित करेंगेय (ख) भारत सरकार और राज्यों द्वारा इसका उचित इस्तेमाल किया जाएगा और यह संग्रहण और उपयोग उन सिद्धांतों के आधार पर किया जाएगा जैसा कि संसद के क़ानून के द्वारा निर्धारित किया हो।
· संविधान के अनुच्छेद 270 की धारा (1) में 'अधिनियम 268 और 269' के स्थान पर 'अधिनियम 268, 268ए और 269' लिखा जाए।
· संविधान की सातवीं अनुसूची में सूची I--केंद्रीय सूची में 92 बी के बाद '92सी-सेवाओं पर कर' को सूचीबद्ध किया जाए।
(89वां संविधान संशोधन) अधिनियम, 2003
· यह संशोधन उस दिन से प्रभावी होगा जिस दिन से केंद्र सरकार इसे अधिसूचना द्वारा सरकारी गजट में शामिल करेगी।
· संविधान के अनुच्छेद 338
(ए) में उपांतिक (मार्जिनल) शीर्षक की जगह निम्नलिखित उपांतिक शीर्षक लिखा जाए: 'अनुसूचित जातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग'
(बी) धारा (1) और (2) के स्थान पर निम्नलिखित धारायें शामिल की जाएँ:
· अनुसूचित जातियों के लिए एक आयोग होना चाहिए जिसे अनुसूचित जातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग के नाम से जाना जाए।
· संसद द्वारा इस बारे में बनाए गए क़ानून के प्रावधानों के मुताबिक आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा तीन अन्य सदस्य होंगे और नियुक्त किए गए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा तीन अन्य सदस्यों की सेवा की शर्तें तथा कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा तय नियमों से निर्धारित होंगे।
(सी) धारा (5), (9) तथा (10) में जहाँ भी "अनुसूचित जनजाति" शब्द प्रयुक्त हुआ हो, उसे हटा दिया जाए। अनुच्छेद 338 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाए।
· 338ए-(1) अनुसूचित जनजातियों के लिए एक आयोग होना चाहिए जिसे अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग के नाम से जाना जाएगा।
· (2) संसद द्वारा इस संदर्भ में पारित किसी क़ानून के प्रावधानों के मुताबिक, आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा तीन अन्य सदस्य होंगे और नियुक्त किए गए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा तीन अन्य सदस्यों की सेवा शर्तें तथा कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा तय नियमों से निर्धारित होंगे।
· (3) आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हाथ से जारी सीलबंद वारंट द्वारा की जाएगी।
· (4) आयोग को अपनी कार्यप्रक्रिया स्वयं निर्धारित करने का अधिकार होगा।
· (5) आयोग का यह कर्त्तव्य होगा कि- (ए) संविधान या वर्तमान में लागू अन्य किसी क़ानून के अंतर्गत या सरकार द्वारा जारी किसी आदेश के तहत अनुसूचित जातियों को दी गई सुरक्षा से संबंधित सभी मामलों की छानबीन एवं निगरानी तथा इन तय सुरक्षा मानदंडों का मूल्यांकनय (बी) अनुसूचित जनजातियों को उनके अधिकारों तथा सुरक्षा तथा सुरक्षा से वंचित करने के संदर्भ में किसी विशेष शिकायत की जांचय (सी) अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में शामिल होना एवं सलाह देना और केंद्र तथा किसी राज्य के अंतर्गत उनके विकास का मूल्यांकनय (डी) निर्धारित सुरक्षा मानकों की कारगर होने या न होने के बारे में आयोग अपनी रिपोर्ट वार्षिक तथा अन्य किसी ऐसे समय, जब उसे उचित लगे, राष्ट्रपति को सौंपेगाय (ई) ऐसी रिपोर्ट अथवा सिफारिशें करेगा, उपाय सुझाएगा जो केंद्र या किसी राज्य सरकार द्वारा इन सुरक्षा उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए उठाए/कार्यान्वित किए जाएंगे ताकि अनुसूचित जन जातियों के हितों की रक्षा, उनका कल्याण और आर्थिक सामाजिक विकास हो सके। (एफ) अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण एवं विकास तथा उनकी प्रगति संबंधी ऐसे अन्य कार्य करेगा जोकि संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के मुताबिक राष्ट्रपति निर्दिष्ट करे।
· (6) राष्ट्रपति यह सुनिश्चित करे कि ऐसी सभी रिपोर्ट संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जांए। साथ ही, केंद्र से संबंधित सिफारिशों के सन्दर्भ में उठाए गए या प्रस्तावित कदमों के बारे में ज्ञापन भी हो जिसमें किसी सिफारिश को अगर स्वीकार नहीं किया गया हो तो उसका कारण भी निर्दिष्ट हो।
· (7) जहाँ ऐसी कोई रिपोर्ट, या उसका कोई हिस्सा, किसी ऐसे मामले से संबंधित हो जोकि किसी राज्य सरकार से संबद्ध हो, ऐसी रिपोर्ट की एक प्रति राज्य के राज्यपाल को भेजी जानी चाहिए जोकि यह सुनिश्चित करे कि वह रिपोर्ट राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाए। साथ ही, राज्य से संबद्ध सिफारिश को अगर स्वीकार नहीं किया गया है, तो उसकी अस्वीकृति के कारणों के बारे में भी बताया जाए।
· (8) आयोग धारा 5 की उपधारा (ए) में दिए गए किसी मामले की छानबीन कर रहा हो या उपधारा बी के तहत किसी शिकायत की जाँच कर रहा हो, ऐसे में वह सभी शक्तियाँ प्राप्त हैं जो किसी मुकदमें की सुनवाई के दौरान सिविल कोर्ट को प्राप्त होती हैं, विशेषतौर से निम्नलिखित मामलों के संदर्भ में, जो इस प्रकार हैं:
· (ए) भारत के किसी भी हिस्से से किसी व्यक्ति की उपस्थिति के लिए उसे सम्मन जारी करना तथा उसकी उपस्थिति दर्ज करना और शपथ से उसकी जाँच करना;
· (बी) किसी दस्तावेज की खोज तथा प्रस्तुति की आवश्यकता पड़ने पर;
· (सी) शपथपत्र पर प्रमाण प्राप्त करने पर;
· (डी) किसी अदालत या कार्यालय से कोई सार्वजनिक रिकार्ड या प्रति प्राप्त करने के लिए प्रार्थना;
· (ई) गवाहों तथा दस्तावेजों की जाँच-परख के लिए कमीशन जारी करना,
· (एफ) अन्य कोई मामला जो किसी नियम के मुताबिक राष्ट्रपति सामने रखे।
· (9) केंद्र तथा सभी राज्य सरकारें अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले सभी बड़े नीतिगत मामलों पर आयोग से विचार-विमर्श करेंगी।
(90वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 2003
· संविधान के अनुच्छेद 332 की धारा (6) में निम्नलिखित उपबंध जोडा जाए, जो कि इस प्रकार है: "असम राज्य के लिए विधानसभा चुनावों हेतु बोडोलैंड प्रोदेशिक क्षेत्रीय जिला सहित निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों तथा गैर-अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व, जैसा कि अधिसूचित हो, तथा जो वर्तमान में बोडोलैंड क्षेत्रीय जिला गठित होने से पहले हैं, को बरकरार रखा जाए।"

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