भारतीय संविधान संशोधन, पहले संविधान संशोधन से लेकर 30वें संविधान संशोधन तक
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| पहले संविधान संशोधन से लेकर 30वें संविधान संशोधन तक |
भारतीय संविधान के संशोधन भाग-1
(प्रथम संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1950
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इस संशोधन में भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए वाक स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के आधार तथा कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने के अधिकार पर प्रतिबंध लगाने के नए अधिकारों की व्यवस्था है।
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इन प्रतिबंधों का प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों अथवा वाक स्वातंत्र्य के अधिकार के सन्दर्भ में अपराध-उद्दीपन और व्यावसायिक या तकनीकी अर्हताएं विहित करने अथवा कोई व्यापार या कारोबार चलाने के अधिकार के संदर्भ में राज्य आदि द्वारा कोई व्यापार, कारोबार, उद्योग अथवा सेवा चलाने के संबंध में किया गया है।
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इस संशोधन द्वारा दो नए अनुच्छेद 31क और 31ख तथा नौवीं अनुसूची को शामिल किया गया, ताकि भूमि सुधार कानूनों को चुनौती न दी जा सकें।
(द्वितीय संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1952
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इस संशोधन द्वारा लोकसभा चुनाव के लिए प्रतिनिधित्व के अनुपात को पुनरू समायोजित किया गया।
(तृतीय संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1954
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इस संशोधन द्वारा सूची 3 (समवर्ती सूची) की प्रविष्टि 33 प्रतिस्थापित की गई है, ताकि वह अनुच्छेद 396 के समरूप हो सके।
(चैथा संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1955
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निजी संपत्ति को अनिवार्यतः अर्जित या अधिग्रहीत करने की राज्य की शक्तियों की फिर से ठीक-ठीक ढंग से व्याख्या करने और इसे उन मामलों से जहाँ राज्य की विनियमनकारी और प्रतिषेधात्मक विधियों के प्रवर्तन से किसी व्यक्ति संपत्ति से वंचित किया गया हो, अलग करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 31 (2) में संशोधन किया गया।
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संविधान के अनुच्छेद 31क की परिधि का जमींदारी अन्मूलन जैसे आवश्यक कल्याणकारी क़ानूनों तक विस्तार करने तथा शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के समुचित आयोजन और देश के खनिज तथा तेल स्त्रोतों पर पूरा नियंत्रण करने के उद्देश्य से इस अनुच्छेद का संशोधन किया गया।
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नौवीं अनुसूची में छह अधिनियम भी शामिल किए गए।
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राज्य-एकाधिपत्यों के लिए उपबंध करने वाली विधियों के समर्थन में अनुच्छेद 305 में भी संशोधन किया गया।
(पाचवाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1955
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इस संशोधन में अनुच्छेद 3 में संशोधन किया गया, जिसमें राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई कि वह राज्य विधान- मंडलों द्वारा अपने-अपने राज्यों के क्षेत्र, सीमाओं आदि पर प्रभाव डालने वाली प्रस्तावित केंद्रीय विधियों के बारे में अपने विचार भेजने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित कर सकते हैं।
(छठा संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1956
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इस संशोधन द्वारा अंतर्राज्यीय व्यापार और वाणिज्य में वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर करों के संबंध में अनुच्छेद 269 और 286 में कुछ परिवर्तन किए गए।
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संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ में एक प्रविष्टि 92क शामिल की गई।
(सातवाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1956
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राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और पारिणामिक परिवर्तनों को शामिल करने के उद्देश्य से यह संशोधन किया गया।
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मोटे तौर पर तत्कालीन राज्यों और राज्य क्षेत्रों का राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के रूप में वर्गीकरण किया गया।
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संशोधन में लोकसभा का गठन, प्रत्येक जनगणना के पश्चात पुनरू समायोजन, नए उच्च न्यायालयों की स्थापना और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों आदि के बारे में उपबंधों की भी व्यवस्था की गई है।
(आठवाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1960
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संसद और राज्य विधानमंडलों में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए और नामनिर्देशन द्वारा आंग्ल भारतीय समुदाय के लिए स्थानों के आरक्षण की अवधि 10 वर्ष तक और बढ़ाने के लिए अनुच्छेद 334 में संशोधन किया गया।
(नौवाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1960
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भारत और पाकिस्तान की सरकारों के बीच हुए करारों के अनुसरण में पाकिस्तान को कतिपय राज्य क्षेत्रों का हस्तांतरण करने की दृष्टि से यह संशोधन किया गया।
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यह संशोधन इसलिए आवश्यक हुआ कि बेरुबाड़ी के हस्तांतरण के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि किसी राज्य-क्षेत्र को किसी दूसरे देश को देने के करार को अनुच्छेद 3 के अधीन बनाई गई किसी विधि द्वारा क्रियांवित नहीं किया जा सकता, अपितु इसे संविधान में संशोधन करके ही क्रियांवित किया जा सकता है।
(दसवाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1961
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दादरा और नगर हवेली के क्षेत्र को केंद्रशासित प्रदेश के रूप में शामिल करने और राष्ट्रपति की विनियम बनाने की शक्तियों के तहत उसमें प्रशासन की व्यवस्था करने के लिए अनुच्छेद 240 और पहली अनुसूची को संशोधित किया गया।
(11वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1961
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इस संशोधन का उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 66 और 71 का इस दृष्टि से संशोधन करना था, जिसमें उपयुक्त निर्वाचकमंडल में किसी ख़ाली पद के आधार पर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को चुनौती न दी जा सके।
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इस संशोधन को डॉ. खरे के मामले के पश्चात् पारित किया गया था।
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डॉ. खरे ने राष्ट्रपति के चुनाव को इसी आधार पर चुनौती दी थी।
(12वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1962
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इस संशोधन के द्वारा गोवा, दमन और दीव को केंद्रशासित प्रदेश के रूप में शामिल किया गया और इस प्रयोजन के लिए अनुच्छेद 240 का संशोधन किया गया।
(13वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1962
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इस संशोधन द्वारा भारत सरकार और नगा पीपुल्स कंवेंशन के बीच हुए एक करार के अनुसरण में नागालैण्ड राज्य के संबध में विशेष उपबंध करने के लिए एक नया अनुच्छेद 371(अ) जोड़ा गया।
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समझौता नागालैण्ड को एक राज्य के रूप में मानने के लिये किया गया था।
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ये अस्थायी प्रावधान तब तक के लिए थे जब तक कि नागालैण्ड को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में घोषित न कर दिया जाए।
(14वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1962
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इस अधिनियम के द्वारा पांडिचेरी केंद्रशासित प्रदेश के रूप में प्रथम अनुसूची में जोड़ा गया और इस अधिनियम द्वारा हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा, दमन और दीव तथा पांडिचेरी के केंद्रशासित प्रदेशों के लिए संसदीय विधि द्वारा विधानमंडलों का गठन किया जा सका।
(15वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1963
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इस संशोधन द्वारा न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने और एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किए जाने वाले न्यायाधीशों को प्रतिपूरक भत्ता देने का उपबंध किया गया।
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इस अधिनियम द्वारा सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थान पर नियुक्त किए जाने की भी व्यवस्था की गई है।
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अनुच्छेद 226 का भी विस्तार किया गया, ताकि उच्च न्यायालयों को यह शक्ति दी जा सके कि वे किसी प्राधिकारी को निर्देश, आदेश या हुक्मनामा (रिट) जारी कर सकें।
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यदि ऐसी शक्ति के प्रयोग के लिए वाद का कारण उन राज्य क्षेत्रों में उत्पन्न हुआ हो, जिनमें वहाँ का उच्च न्यायालय क्षेत्राधिकार का प्रयोग करता है, चाहे उस सरकारी अधिकारी का स्थान इन राज्य क्षेत्रों के अंदर नहीं हो।
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इस अधिनियम द्वारा सेवा आयोगों के अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसकी शक्तियों का प्रयोग किसी एक सदस्य द्वारा किए जाने का भी प्रावधान है।
(16वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1963
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इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 19 में संशोधन किया गया, जिसमें भारत की प्रभुसत्ता और अखंडता के हित में वाक और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य, शांतिपूर्ण और शस्त्ररहित सम्मेलन तथा संस्था बनाने के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया गया।
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संसद और राज्य विधानमंडलों के निर्वाचन के लिए उम्मीदवारों द्वारा ली जाने वाली शपथ या अधिनियम का संशोधन करके उसमें यह शर्त भी शामिल की गई कि वे भारत की प्रभुसत्ता और अखंडता को अक्षुण रखेंगे।
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इन संशोधनों का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना है।
(17वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1964
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अनुच्छेद 31क में और आगे संशोधन किया गया, जिसके अनुसार निजी खेती के अधीन भूमि का अधिग्रहण तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि प्रतिपूर्ति के रूप में उसका बाजार मूल्य न दिया जाए।
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साथ ही, इस संशोधन द्वारा उक्त अनुच्छेद में दी गई ‘सम्पदा' की परिभाषा को पीछे की तारीख से लागू किया गया।
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नौवीं अनुसूची में भी संशोधन किया गया और उसमें 44 और अधिनियम शामिल किए गए।
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इसका उद्देश्य केरल और मद्रास राज्य द्वारा पारित भूमि सुधार अधिनियमों को सांविधानिक संरक्षण प्रदान करना है।
(18वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1966
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इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 3 का संशोधन यह स्पष्ट करने के लिए किया गया कि राज्य शब्द में केंद्रशासित प्रदेश भी शामिल होगा और इस अनुच्छेद के तहत नया राज्य बनाने की शाक्ति में किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के एक भाग की किसी दूसरे राज्य या केन्द्रशासित प्रदेश से मिलाकर एक नया राज्य या केन्द्रशासित प्रदेश बनाने की शक्ति को भी शामिल किया गया।
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इसका उद्देश्य पंजाब और हिमाचल प्रदेश संघ राज्य-क्षेत्रों के पुनर्गठन के लिए संसद को शक्ति प्रदान करना है।
(19वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1966
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निर्वाचन न्यायाधिकारणों को समाप्त करने और उच्च न्यायालय द्वारा चुनाव याचिकाओं की सुनवाई किए जाने के निर्णय के परिणामस्वरूप अनुच्छेद 324 का संशोधन इस पारिणामिक परिवर्तन के लिए किया गया।
(20वां संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1966
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यह संशोधन चन्द्रमोहन बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय के कारण आवश्यक हुआ, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राज्य में जिला न्यायाधीशों की कतिपय नियुक्तियों को निरस्त घोषित कर दिया था।
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एक नया अनुच्छेद 233क जोड़ा गया और राज्यपाल द्वारा की गई नियुक्तियों को निरस्त घोषित कर दिया गया।
(21वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1967
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इस अधिनियम द्वारा सिंधी भाषा को अष्टम अनुसूची में शामिल किया गया।
(22वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1969
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यह अधिनियम असम राज्य में एक नए स्वायत्त राज्य मेघालय का निर्माण करने की दृष्टि से लागू किया गया।
(23वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1969
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अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों तथा आंग्ल भारतीयों के लिए संसद और राज्य विधानमंडलों में स्थानों के आरक्षण की अवधि 10 वर्ष तक और बढ़ाने के लिए अनुच्छेद 334 का संशोधन किया गया।
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इसके लिए अनुच्छेद 334 में ‘20 वर्ष'
के स्थान पर ‘30 वर्ष' शब्द रख दिया गया।
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प्रारम्भ में इन जातियों के लिए आरक्षण 10 वर्ष के लिए किया गया था।
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आठवें संविधान संशोधन द्वारा इसे 20 वर्ष कर दिया गया और अब प्रस्तुत संशोधन द्वारा इसे 30 वर्ष तक के लिए कर दिया गया है।
(24वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1971
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यह संशोधन गोलकनाथ के मामले में उत्पन्न स्थिति के संदर्भ में पारित हुआ।
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तदनुसार इस अधिनियम द्वारा मूल अधिकारों सहित संविधान में संशोधन करने के संसद के अधिकारों के बारे में सभी प्रकार के संदेहों को दूर करने के लिए अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 में संशोधन किया गया।
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संशोधन रूप में अनुच्छेद 368 द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया कि इसमें संविधान-संशोधन करने की प्रक्रिया और शक्ति दोनों शामिल हैं।
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इसने गोलकनाथ के मामले के प्रभाव को ही दूर नहीं किया, बल्कि संशोधन शक्ति को और विस्तृत करने के लिए इन शब्दों को भी जोड़ दिया कि संशोधन की शक्ति में किसी उपबन्ध के जोड़ने, परिवर्तित करने और निरसित करने की शक्ति भी शामिल है।
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अनुच्छेद 13 में एक नया खण्ड जोड़कर यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि अनुच्छेद 13 के अर्थांतर्गत अनुच्छेद 368 के अधीन पारित सांविधानिक संशोधन ‘विधि' नहीं है।
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केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के वाद में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के (24वें संशोधन) अधिनियम को विधिमान्य घोषित किया है।
(25वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1971
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इस संशोधन द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मामले को देखते हुए अनुच्छेद 31 में संशोधन किया गया।
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‘मुआवजा' शब्द की ‘पर्याप्त
मुआवजा'
के रूप में न्यायिक व्याख्या को देखते हुए ‘मुआवजा' शब्द के स्थान पर ‘कम' शब्द रखा गया।
(26वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1971
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इस संशोधन द्वारा भारतीय रियासतों के शासकों के ‘प्रिवीपर्स' और विशेषाधिकारों को समाप्त किया गया।
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यह संशोधन माधवराव के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के परिणामस्वरूप पारित किया गया।
(27वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1971
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यह संशोधन अधिनियम उत्तर-पूर्वी राज्यों के पुनर्गठन के कारण आवश्यक कतिपय बातों की व्यवस्था करने के लिए पारित किया गया।
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एक नया अनुच्छेद 239 ख जोड़ा गया, जिससे कुछ केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन अध्यादेश जारी करने के लिए समर्थ हो गए।
(28वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1972
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यह संशोधन भारतीय सिविल सेवा के सदस्यों के छुट्टी, पेंशन और अनुशासन के मामलों के संबधं में विशेषाधिकारों को समाप्त करने के लिए पारित किया गया।
(29वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1972
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संविधान की नौंवी अनुसूची का संशोधन करके उसमें भूमि सुधार के बारे में केरल के दो अधिनियम शामिल किए गए।
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पहला केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1919 और दूसरा केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1971।
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नवम् अनुसूची में शामिल किये गये अधिनियमों की वैधता को मूल अधिकारों के अतिक्रमण के आधार पर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
(30वाँ संविधान
संशोधन) अधिनियम, 1972
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इस संशोधन का उद्देश्य अनुच्छेद 133 का संशोधन करके उसमें निर्धारित 20,000 रुपये की मूल्यांकन परीक्षा समाप्त करना तथा उसके स्थान पर सिविल कार्यवाही में उच्चतम न्यायालय में अपील की व्यवस्था करना है, जो केवल उच्च न्यायालय के इस प्रमाणपत्र पर ही की जा सकेगी कि उस मामले में सामान्य महत्व की विधि का सारवान प्रश्न अंतरग्रस्त है और उच्च न्यायालय की राय में उस प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है।
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इस संशोधन की सिफारिश विधि-आयोग ने की थी।

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